मूल आधिकारिक विज्ञप्ति पर आधारित स्रोत-संपादित समाचार। तारीख और कथन उसी विज्ञप्ति के संदर्भ में पढ़ें।
वन प्रबंधन का भविष्य केवल नियम लागू करने तक सीमित नहीं रह सकता। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 12 अक्टूबर को नई दिल्ली में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों से संवाद में वैज्ञानिक निर्णय, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और नई तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया। मंत्रालय की विज्ञप्ति के अनुसार, उन्होंने जंगलों की आग, मानव–वन्यजीव संघर्ष और जलवायु परिवर्तन को प्रमुख चुनौतियों में गिनाया।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी का यह मध्य-सेवा प्रशिक्षण कार्यक्रम 12 अक्टूबर से 6 नवंबर 2026 तक चलेगा। इसमें 18 संवर्गों के 68 अधिकारी शामिल हैं, जिनका सेवाकाल सात से नौ वर्ष है। उद्देश्य नेतृत्व क्षमता, नीतियों के क्रियान्वयन और जमीनी वन प्रशासन को मजबूत करना है।
उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित अध्ययन दौरों के दौरान अधिकारी वन्यजीव प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, इकोटूरिज्म और समुदाय-आधारित वन प्रबंधन की कार्यप्रणालियाँ समझेंगे। ये दौरे प्रशिक्षण का हिस्सा हैं; इन्हें पूरा हो चुका कार्यक्रम नहीं बताया गया है।
मंत्री ने भौगोलिक सूचना प्रणाली, रिमोट सेंसिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ पारंपरिक स्थानीय ज्ञान को भी उपयोगी बताया। प्रशिक्षण में जलागम प्रबंधन, जलवायु वित्त, संस्थागत निर्णय और संघर्ष समाधान जैसे विषय शामिल होंगे। संदेश यह रहा कि विकास संबंधी फैसलों में आर्थिक जरूरतों के साथ पारिस्थितिक सुरक्षा भी केंद्रीय स्थान रखे।