भारत के पास दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी है, जबकि वैश्विक मीठे पानी के संसाधनों में उसका हिस्सा करीब चार प्रतिशत बताया जाता है। 22 सितंबर से नई दिल्ली में शुरू हुए नौवें इंडिया इंटरनेशनल वॉटर वीक में इसी असंतुलन और जलवायु परिवर्तन से बढ़ते जोखिमों को चर्चा के केंद्र में रखा गया। पांच दिवसीय कार्यक्रम का विषय “जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन” है। ये अनुपात उद्घाटन भाषण में दिए गए सरकारी संदर्भ आंकड़े हैं; अलग-अलग आकलनों में परिभाषा और वर्ष के आधार पर अंतर हो सकता है।
जलवायु-अनुकूल प्रबंधन का अर्थ केवल नया बांध या पाइपलाइन बनाना नहीं है। इसमें नदी-बेसिन के स्तर पर उपलब्धता और मांग का आकलन, भूजल पुनर्भरण, वर्षा जल संचयन, कम पानी वाली सिंचाई, शहरों में रिसाव घटाना और प्रदूषित पानी का उपचार शामिल है। बाढ़ और सूखे को अलग समस्याओं की तरह देखने के बजाय भूमि उपयोग, आर्द्रभूमि, जल निकासी और भंडारण के साझा तंत्र से जोड़ना पड़ता है। किसी परियोजना का समाधान स्थानीय पारिस्थितिकी, विस्थापन और नीचे की धारा पर असर की जांच के बाद ही तय होना चाहिए।
घरेलू स्तर पर नल बंद रखना और सीमित पानी इस्तेमाल करना उपयोगी है, लेकिन कुल समाधान का भार केवल नागरिक पर नहीं डाला जा सकता। नगर निकायों को वितरण नुकसान प्रकाशित करना चाहिए, उद्योगों को जल-उपयोग और उपचार की जानकारी देनी चाहिए तथा राज्यों को नदी और भूजल डेटा साझा करना चाहिए। केंद्र ने राज्यों के बीच जल बंटवारे से जुड़े दस समझौतों का उल्लेख किया, पर उनकी सफलता वास्तविक प्रवाह, पर्यावरणीय अनुपालन और विवाद समाधान से मापी जाएगी। पाठक अपने शहर या ग्राम पंचायत से जल गुणवत्ता रिपोर्ट, आपूर्ति समय और वर्षा जल संरचनाओं की स्थिति पूछ सकते हैं।